कुछ भी आपत्ति से परे नही है

कुछ बीमा एजेंटों की शिकायत यह रहती है कि बीमा खरीदते समय लोग बहुत से सवाल पूछते हैं और बहुत सारे ऑब्जेक्शन खड़े करते हैं यह एक सामान्य बात है वास्तव में यदि आप देखें तो दुनिया में कुछ भी बेचना आपत्ति से परे नहीं है यानी ऐसा कोई भी बिक्री नहीं होती है जिसमें सवाल खड़े ना किए जा सकें इसे एक उदाहरण से समझें यदि आप एक कार के सेल्समैन है तो आप देखेंगे कि ग्राहक ऐसी कार खरीदना चाहेंगे जो देखने में बहुत खूबसूरत हो सकती हो कम खर्च में चलती हो अंदर जगह बहुत ज्यादा हो स्टेटस सिंबल हो पार्किंग में जगह कम गिरे वगैरह अब आप सोच कर देखें दुनिया में क्या ऐसी कोई कार है यह हो सकती है जिसमें यह सब खूबियां हो ऐसी कार होना संभव ही नहीं है क्योंकि इसमें जिन गुणों को हम ढूंढ रहे हैं वे परस्पर विरोधी हैं सस्ती कार का स्टेटस सिंबल होना अंदर से ज्यादा जगह होने पर भी पार्किंग में कम जगह घेर ना सब सुविधाएं और लग्जरी फीचर्स होने पर भी देखने का खर्च कम होना बहुत पावरफुल इंजन होने पर भी पेट्रोल का खर्च कम होना आदि ऐसे विरोधाभास हैं जो किसी भी एक कार में संभव नहीं है अब यदि ऐसी आदर्श कार दुनिया में बनी ही नहीं है या बनना संभव ही नहीं है तो ऐसा तो नहीं है कि लोग कार नहीं खरीदते हैं ग्राहक को सब कुछ किसी भी कार में नहीं मिलता है मतलब उसके हाथ से कुछ तो छूटना ही है और जो छूटना है उस पर आपत्ति तो ग्राहक को करनी ही है यदि आप सस्ती छोटे साइज की कार बेचेंगे तो ग्राहक को स्टेटस सिंबल नहीं दिखाई देगा यदि बड़ी कार दिखाएंगे तो पार्किंग की समस्या आड़े आएगी इस स्थिति में ग्राहक को आप उसके चुने हुए गुणों के आधार पर कार भेजते हैं इसका सार यही है कि ग्राहक जो कुछ चाहता है वह सब उसे एक प्रोडक्ट में नहीं मिल सकता है उसे कुछ चीजें छोड़ने ही पड़ेगी और सेल्समेन चाहे किसी भी चीज का हो उसका काम ग्राहक को यही समझाना है कि उसे सब कुछ नहीं मिल सकता ग्राहक के लिए जो बातें जो गुण सबसे महत्वपूर्ण है वह उनके हिसाब से सामान खरीद लेता है बीमा एजेंट के रूप में आप ग्राहक को किसी भी ऐसी चीज का उदाहरण दे सकते हैं जो वह पहले से प्रयोग कर रहा है जैसे की तान्या घड़ी अब घड़ी सस्ती है तो स्टेटस सिंबल नहीं है स्टेटस सिंबल है तो महंगी है यह सिद्धांत वित्तीय चीजों पर भी लागू होता है जब भी कोई व्यक्ति निवेश करना चाहता है तो वह तीन चीजें देखता है पैसे की सुरक्षा लिक्विडिटी और बेहतर रिटर्न वास्तव में दुनिया में ऐसा कोई भी निवेश नहीं है जिसमें तीनों चीजें हो आपके पैसे की सबसे बेहतर सुरक्षा बैंक में फिक्स डिपॉजिट में हो सकती है लेकिन उसमें सबसे कम होगा शेयर मार्केट में पैसा ज्यादा तेजी से बढ़ सकता है लेकिन वहां पैसे की सुरक्षा की गारंटी नहीं होती प्रॉपर्टी में पैसे कुछ हद तक हो सकती है और रिटर्न भी आने की संभावना रहती है लेकिन उसमें लिक्विडिटी नहीं होती यानी आप जब चाहे उसे बेचकर पैसा प्राप्त नहीं कर सकते इसका अर्थ है कि ग्राहक को इन तीनों में से कोई एक ही छोड़नी होगी हर ग्राहक अपनी सोच के अनुसार अलग-अलग चीज छोड़ना चाहेगा इसलिए बैंकों में बेहिसाब पैसा फिक्स डिपाजिट में रखा जाता है तो दूसरी और प्रॉपर्टी और शेयर मार्केट में भी लोग खूब निवेश करते हैं इस सारी चर्चा का अर्थ यही है कि कुछ भी खरीदने से पहले ग्राहक गतिरोध उत्पन्न करता ही है क्योंकि जो उसे छोड़ना पड़ रहा है उसे वह आसानी से छोड़ना नहीं चाहता बीमा बेचते हुए इस गतिरोध को सामान्य समझें जितनी बड़ी खरीद उतना बड़ा गतिरोध अक्सर बीमा एजेंट यह शिकायत करते हैं कि जीवन बीमा में ग्राहक निर्णय लेने में बाकी चीजों की अपेक्षा बहुत ज्यादा समय लगाता है दो या तीन बार डालने के बाद ही ग्राहक पॉलिसी लेने का निर्णय लेता है यह बात बिल्कुल सही है और हमें इसका तर्क समझना होगा ग्राहक को जितनी महंगी चीज खरीदनी होती है उतना ही ज्यादा समय वह निर्णय लेने में लगाता है आप जितने समय में एक छोटा केलकुलेटर खरीद लेते हैं उतनी देर में कंप्यूटर नहीं खरीदते आप तो पेस्ट खरीदने में जितना समय लगाते हैं साइकिल खरीदने में उससे ज्यादा समय लगाते हैं कार खरीदने में उससे ज्यादा और मकान खरीदने में उससे भी ज्यादा जहां टूथपेस्ट खरीदने में 10 मिनट लगते हैं वहीं मकान में कुछ महीने या साल भी लग सकते हैं यह सिद्धांत जीवन बीमा पर भी लागू होता है बीमा एजेंट को लगता है कि ग्राहक 20000 का प्रीमियम देने में इतनी आनाकानी कर रहा है ग्राहक के लिए यह निर्णय 20000 का नहीं है यदि उसे 20000 की सालाना किश्त 20 साल तक देनी है तो उसके लिए यह निर्णय ₹400000 का है और इसके लिए वह तुरंत निर्णय नहीं ले सकता इस चर्चा से यह स्पष्ट है कि जीवन बीमा बेचने में ज्यादा समय और श्रम लगना स्वाभाविक ही है आपके लिए जो पॉलिसी 20000 की है वह ग्राहक के लिए चार लाख की है यदि ग्राहक को आप ऐसी पॉलिसी बेचते बेचते जिसमें उसे एक ही बार ₹20000 देना होता तो है निर्णय लेने में इतना समय नहीं लगा था क्योंकि तब उसके लिए यह 20000 की ही खरीद होती

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