जिन बातों के बारे मे मैं सोच रहा था, वे ये हैं, बेटे। मै आज तुम पर बहुत नाराज हुआ। जब तुम स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहे थे, तब मैंने तुम्हे खूब ङांटा...तुमने टाॅवेल के बजाए पर्दे से हाथ पोंछ लिए थे। तुम्हारे जूते गंदे थे, इस बात पर भी मैंने तुम्हे कोसा। तुमने फर्श पर इधर-उधर चीजें फेंक रखी थीं...इस पर मैंने तुम्हे भला-बुरा कहा।
नाश्ता करते वक्त भी मैं तुम्हारी एक के बाद एक गलतियाँ निकालता रहा। तुमने ङाइनिंग टेबल पर खाना बिखरा दिया था। खाते समय तुम्हारे मुँह से चपङ-चपङ की आवाज आ रही थी। मेज पर तुमने कोहनियाॅ भी टिका रखी थीं। तुमने ब्रेङ पर बहुत सारा मक्खन भी चुपङ लिया था। यही नही जब मै ऑफिस जा रहा था और तुम खेलने जा रहे थे और तुमने मुडकर हाथ हिलाकर ''बाय-बाय, ङैङीʼʼ कहा था, तब भी मैंने भृकुटी तानकर टोका था, "अपनी काॅलर ठीक करो।ʼʼ
शाम को भी मैंने यही सब किया। ऑफिस से लौटकर मैंने देखा कि तुम दोस्तों के साथ मिट्टी मे खेल रहे थे। तुम्हारे कपडे गंदे थे, तुम्हारे मोजों मे छेद हो गए थे। मैं तुम्हे पकङकर ले गया और तुम्हारे दोस्तों के सामने तुम्हे अपमानित किया। मोजे मंहगे हैं- जब तुम्हे खरीदने पङेंगे तब तुम्हे इनकी कीमत समझ आएगी। जरा सोचिए तो सही, एक पिता अपने बेटे का दिल किस तरह दुखा सकता है ?
क्या तुम्हे याद है जब मै लाइब्रेरी मे पढ रहा था तब तुम रात को मेरे कमरे मे आए थे, किसी सहमे हुए मृगछौने की तरह। तुम्हारी ऑंखें बता रही थीं कि तुम्हे कितनी चोट पहुँची है। और मैने अखबार के ऊपर से देखते हुए पढने मे बाधा ङालने के लिए तुम्हे झिङक दिया था, ''कभी तो चैन से रहने दिया करो। अब क्या बात है ?ʼʼ और तुम दरवाजे पर ही ठिठक गए थे।
तुमने कुछ नही कहा था, बस भागकर मेरे गले मे अपनी बाँहें ङालकर मुझे चुमा था और "गुङनाइट" कहकर चले गए थे। तुम्हारी नन्ही बाँहों की जकङन बता रही थी के तुम्हारे दिल मे ईश्वर ने प्रेम का ऐसा फूल खिलाया है जो इतनी उपेक्षा के बाद भी नही मुरझाया। और फिर तुम सीढ़ियों पर खट-खट करके चढ़ गए।
तो बेटे, इस घटना के कुछ ही देर बाद मेरे हाथों से अखबार छूट गया और मुझे बहुत ग्लानि हुई। यह क्या होता जा रहा है मुझे ? गलतियाँ ढूँढने की, ङाँटने-ङपटने की आदत सी पङती जा रही है मुझे। अपने बच्चे के बचपन का यह पुरस्कार दे रहा हूँ। ऐसा नहीं है, बेटे, कि मैं तुम्हे प्यार नही करता, पर मैं एक बच्चे से जरूरत से ज्यादा उम्मीदें लगा बैठा था। मैं तुम्हारे व्यवहार को अपनी उम्र के तराजू पर तौल रहा था।
तुम इतने प्यारे हो, इतने अच्छे और सच्चे। तुम्हारा नन्हा सा दिल इतना बङा है जैसे चौङी पहाडियों के पीछे से उगती सुबह। तुम्हारा बड़प्पन इसी बात से नजर आता है कि दिन भर ड़ाँटते रहने वाले पापा को भी तुम रात को "गुडनाइट किस" देने आए। आज की रात और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है, बेटे। मैं अँधेरे मे तुम्हारे सिरहाने आया हूँ और मैं यहाँ पर घुटने टिकाए बैठा हूँ, शर्मिंदा।
यह एक कमजोर पश्चाताप है। मैं जानता हूँ कि अगर मैं तुम्हे जगाकर यह सब कहूँगा, तो शायद तुम नही समझ पाओगे। पर कल से मैं सचमुच तुम्हारा प्यारा पापा बनकर दिखाउँगा। मैं तुम्हारे साथ खेलूँगा, तुम्हारी मजेदार बातें मन लगाकर सुनूँगा, तुम्हारे साथ खुलकर हसूँगा और तुम्हारी तकलीफों को बाटूँगा। आगे से जब भी मै तुम्हे डाँटने के लिए मुँह खोलूँगा, तो इसके पहले अपनी जीभ को अपने दाँतों मे दबा लूँगा। मै बार-बार किसी मन्त्र की तरह यह कहना सीखूँगा, "वह तो अभी बच्चा है...छोटा सा बच्चा!"
मुझे अफसोस है कि मैने तुम्हे बच्चा नही, बडा मान लिया था। परंतु आज जब मै तुम्हे गुडी-मुडी और थका-थका पलंग पर सोया देख रहा हूँ, बेटे, तो मुझे एहसास होता है कि तुम अभी बच्चे ही तो हो। कल तक तुम अपनी माँ की बाँहों मे थे, उसके कांधे पर सिर रखे। मैंने तुमसे कितनी ज्यादा उम्मीदें की थीं, कितनी ज्यादा!
लोगों की आलोचना करने के बजाए हमें उन्हे समझने की कोशिश करनी चाहिए। हमें यह पता लगाना चाहिए कि जो काम वे करते हैं, उन्हे वे क्यों करते हैं। यह आलोचना करने से बहुत ज्यादा रोचक और लाभदायक होगा। यही नही, इससे सहानुभूति, सहनशक्ति और दयालुता का माहौल भी बनेगा। "सबको समझ लेने का मतलब है सबको माफ कर देना।"
डाॅ.जानसन ने कहा था, "भगवान खुद इंसान की मौत से पहले उसका फैसला नही करता।"
फिर आप और मै इसका फैसला करने वाले कौन होते हैं ?
सिद्धांत
"बुराई मत करो, निंदा मत करो,
शिकायत मत करो।"










